उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga )

उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga in Hindi ) :

उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga ke Labh in Hindi ) :

  • पहली विधि :

Uttanpadasana Yoga – इस आसन को हवादार, स्वच्छ व शांत जगह पर करना चाहिए। इस आसन के लिए फर्श पर दरी या चटाई बिछा लें। चटाई पर पीठ के बल लेट जाएं और शरीर को बिल्कुल सीधा रखें। हाथों को दोनों बगल में सीधा शरीर से सटाकर व हथेलियों को फर्श की ओर करके रखें। अपने दोनों पैरों, एड़ियों व पंजों को मिलाकर सामने की ओर करके सीधा व तानकर रखें। अब ऊपर देखते हुए धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचते हुए पूर्ण रूप से वायु को फेफड़ों में भर लें। इसके बाद अपनी सांस को रोक कर अपने दोनो पैरों को धीरे-धीरे ऊपर (लगभग 10 इंच) तक उठाएं। इस स्थिति में 6 से 8 सैकेंड तक रहें और फिर धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़े और पैरों को धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में ले आएं। इसके बाद 6 से 8 सैकेंड तक आराम करें और पुन: इस क्रिया को करें। इस तरह से इस क्रिया को 10 बार करें। पैरों को 10 इंच की ऊंचाई पर रखने में परेशानी हो तो पैरों को थोड़ा और ऊपर उठा लें। इससे पैरों पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है।

  • विशेष :

पैरों को ऊपर उठाते समय आपस में मिलाएं रहें लेकिन कमर से ऊपर का भाग नहीं हिलना चाहिए। अपने पैर को 10 इंच से अधिक ऊपर न उठाएं क्योंकि इतनी ऊंचाई पर पैरों पर अधिक जोर नहीं पड़ता है। इस आसन को खाली पेट सुबह व शाम कर सकते हैं। इस आसन को दोनो पैरों से 3-3 बार करें। इस आसन को स्त्री-पुरुष तथा 6 से 7 वर्ष के बच्चे भी कर सकते हैं। इस आसन का लाभ सर्वांगासन की तरह ही होता है। जिन्हें पीठ पर चोट लगी हो या जो बहुत कमजोर हो उन्हें पहले ´अर्द्ध उत्तानपादासन´ का अभ्यास करना चाहिए।

  • अद्ध उत्तानपादासन करने की विधि (Uttanpadasana Yoga Vidhi) :

इस आसन में दोनों पैरो को एक साथ ऊपर उठाने के स्थान पर एक-एक पैर को बारी-बारी से ऊपर उठाकर इस आसन को पहले की ही तरह से करें। पहले पूर्ण रूप से सांस लेकर सांस को रोकते हुए पहले बांए पैर को ऊपर उठाएं और कुछ देर रुककर फिर सांस छोड़ते हुए पैर को सामान्य स्थिति में ले आएं। यही क्रिया दाएं पैर के साथ भी करें ! यह अभ्यास दोनों पैरों से 10-10 बार करें। इस आसन का अभ्यास पूर्ण रूप से करने में सफल होने के बाद उत्तानपादासन करें।

  • दूसरी विधि : 

Uttanpadasana Yoga – आसन के अभ्यास के लिए पहले की तरह ही स्थान को चुनें और नीचे दरी बिछाकर पीठ के बल लेट जाएं। दोनों हाथों को दोनो बगलों में नितम्ब (हिप्स) से सटाकर रखें। दोनो पैरों को आपस में मिलाकर व तानकर रखें। अब धीरे-धीरे दोनो पैरों को ऊपर उठाएं और साथ ही सिर को भी ऊपर उठाएं ! इस तरह सिर से नाभि तक के भागों को और पंजों से जांघों तक के भाग को ऊपर उठा लें। आसन की इस स्थिति में पूरे शरीर का भार कमर पर रखें और हाथों को फर्श से ऊपर जांघों पर रखें। इसमें शरीर के दोनो ओर का भाग बराबर उठा रहता हैं। जितनी देर तक इस स्थिति में रहना सम्भव हो रहें और फिर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं।

  • विशेष : 

इस आसन के शुरुआती अभ्यास में शरीर में कंपन होता है, परंतु इसके नियमित अभ्यास से शरीर में स्थिरता और मजबूती आती है।

  • सावधानी ( Uttanpadasana Yoga Savdhani) : 

उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर), सर्वाईकल, स्पोंडिलाइसिस आदि रोगों वाले रोगियों को यह आसन नहीं करना चाहिए। इस आसन को करने से मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) पर जोर पड़ता है. इसलिए मेरूदंड व कमर में किसी भी प्रकार का दर्द या कष्ट आदि हो तो उसे `पूर्ण उत्तानपादासन´ नहीं करना चाहिए। इस आसन के स्थान पर `अर्द्ध उत्तानपादासन´ करना लाभकारी होता है।

  • आसन से रोग में लाभ (Uttanpadasana Yoga Labh) :
  • पहली विधि : 

Uttanpadasana Yoga – इस आसन से मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) मजबूत तथा शरीर के अन्दर की सभी कोशिकाएं पुष्ट होती हैं। यह आसन स्नायुतंत्र (नर्वससिस्टम) को क्रियाशील बनाता है तथा उनके विकारों को दूर करता है। यह आसन शरीर की 72000 नाड़ियों को प्रभावित करता है जिससे उनमें उत्पन्न होने वाली सारी बीमारियां ठीक हो जाती है। इस आसन से पेट व नितम्बों की चर्बी घटती है तथा पेट की आन्तरिक गड़बड़ियां, जलोदर (पेट में पानी का भरना) और आमाशय की जलन मिटती है। यह आसन पाचनशक्ति को मजबूत करता है तथा भूख को बढ़ाता है। इस आसन को करने से नाभि का टलना बन्द हो जाता है तथा जिसकी नाभि टल गई हो उसे यह आसन 5 मिनट तक करना चाहिए ! इससे नाभि अपने वास्तविक स्थान पर आ जाती है। इससे अपच (खाना न पचना), भोजन के बाद खट्टी-मीठी डकारें आना, वमन (उल्टी), पेट में गैस बनना, कोष्ठबद्धता, सामान्य दस्त, मरोड़, खूनी दस्त आदि ठीक होते हैं। इससे पीठ का दर्द, पैरों का दर्द, पेट का दर्द आदि दूर होते हैं। यह आसन खून को साफ करने के साथ-साथ पैरों का सुन्न हो जाना व झन्नाहट आदि शिकायतें भी दूर करता है। इस आसन को करने से कद बढता है।
प्रसव के बाद महिलाओं के स्वाभाविक स्थिति में आने के बाद इस आसन को करने से पेड़ू का भददापन दूर होता है। इसके अभ्यास से हर्निया रोग नहीं होता है। इस आसन के निरंतर अभ्यास से घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना, सांस फूलना और खांसी आदि रोग दूर होते हैं।

  • दूसरी विधि :

Uttanpadasana Yoga – यह आसन नाभि के चार महत्त्वपूर्ण आसनों में से एक है.  इसके अभ्यास से नाभि तंत्र की 72864 नाड़ियों की मसाज होती है। यह रक्तसंचार को ठीक करता है तथा घबराहट को दूर करता है।

Updated: August 17, 2016 — 5:20 am

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