Category: योग आसन के लाभ

उत्कटासन योग ( Utkatasana Yoga Ke Labh )

उत्कटासन योग ( Utkatasana Yoga Ke Labh ) :

Utkatasana Yoga – उत्कटासन में शरीर का पूरा भार पंजों पर होता है और शरीर कुछ ऊपर उठा होता है। इस आसन से योगियों को चरम सीमा पर पहुंचाने वाली कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। नाभि की विकृति से ही पूरे शरीर में अनेक प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होती हैं, जिन्हें इस आसन के अभ्यासों द्वारा दूर किया जा सकता है।

उत्कटासन को 2 प्रकार से कर सकते हैं-

  • पहली विधि-

Utkatasana Yoga – इस आसन के लिए पहले दोनों पैरों को मिलाकर सावधान की स्थिति में खड़े हो जाएं। अब धीरे-धीरे पंजों के सहारे बैठ जाएं। अब दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर घुटनों पर रखें तथा दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर रखें। अब अंगुलियों के जोड़ पर ठोड़ी को रखकर सामने की ओर देखें। आसन की इस स्थिति में जितनी देर तक सम्भव हो रहें।

ध्यान :

इस आसन में मणिपूरक या अनाहत चक्र पर ध्यान देना चाहिए। इस आसन में शरीर के बिंदुओं पर दबाव पड़ता है। इस आसन में मेरूदंड की तरंगे नीचे से ऊपर की ओर चढ़ने लगती है। उत्कटासन में कमर एवं रीढ़ की हड्डी के जोड़ से बिंदु तक ध्यान लगाया जाता है।

आसन से रोगों में लाभ (Utkatasana Yoga Labh) :-

उत्कटासन के अभ्यास से कमर व अन्य जोड़ों का दर्द ठीक होता है। इससे पैरों के पंजों व अंगुलियों में मजबूती आती है। इससे ब्रह्मचर्य की प्राप्ति होती है तथा यह आसन कुछ यौगिक क्रियाओं में सहायक है। यह आसन मस्तिष्क को ताजगी देता है, गुप्त रोगों को दूर करता है। इस आसन के साथ उड्डीयान बंध भी किया जाता है, जिससे पेट के सभी विकार दूर होते हैं। उत्कटासन में बैठकर ही जलबस्ती या पवनबस्ती क्रिया की जाती है। बज्रोली का अभ्यास इस आसन के बिना नहीं किया जा सकता। इस आसन में पेट से लेकर सिर तक के खून को अपने बल द्वारा खींचा जाता है। इस आसन में बैठ कर ही अधिकांश योगी नोली घुमाया करते हैं, यह आसन योगियों का परम गुप्त आसन है। यह आसन स्त्रियों के प्रसव के बाद बढ़े पेट के ढीलेपन को दूर करता है तथा यह आसन गर्भाशय सम्बंधित बीमारियों को दूर करता है। इस आसन से मासिकधर्म सम्बंधित बीमारियां तथा अनियमितता दूर होती है। इस आसन से शरीर के अन्दर स्निग्धता उत्पन्न होती है, जिससे शरीर पर चिकनापन और कोमलता आ जाती है और शरीर सुन्दर, आकर्षक व चेहरा कीर्तिमान बना रहता है।

  • दूसरी विधि-

Utkatasana Yoga – इस आसन के अभ्यास के लिए पहले की तरह ही सीधे सावधान की स्थिति में खड़े हो जाएं। अब दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाकर सीधा करके रखें। फिर धीरे-धीरे घुटनों को मोड़ते हुए एड़ी को उठाकर पंजों के बल बैठ जाएं। इस स्थिति में 1 मिनट तक रहें। फिर हाथ की स्थिति पहले की तरह आगे की ओर रखते हुए धीरे-धीरे एड़ियों को टिकाते हुए उठकर खड़े हो जाएं। इस तरह से इस क्रिया को 5 से 10 बार करें।

दूसरी विधि से रोगो में लाभ (Utkatasana Yoga Labh) :-

यह आसन स्त्रियों के लिए विशेष लाभकारी है। इसके अभ्यास से अपच (भोजन का न पचना), अरुचि (भोजन करने की इच्छा न होना), अफारा (गैस का बनना), कब्ज एवं पेट आदि के सभी रोग दूर होते हैं। इससे पेट का मोटापा घटता है तथा रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है। इस आसन को करने से गठिया, साईटिका आदि पैरों की बीमारी दूर हो जाती है। हाथ-पैरों में चुस्ती व शरीर को स्फूर्ति मिलती है। यह भूख को बढ़ाता है तथा पैरों को शक्तिशाली बनाता है, जिससे अधिक चलने से होने वाला दर्द ठीक हो जाता है।

उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga )

उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga in Hindi ) :

उत्तानपादासन योग ( Uttanpadasana Yoga ke Labh in Hindi ) :

  • पहली विधि :

Uttanpadasana Yoga – इस आसन को हवादार, स्वच्छ व शांत जगह पर करना चाहिए। इस आसन के लिए फर्श पर दरी या चटाई बिछा लें। चटाई पर पीठ के बल लेट जाएं और शरीर को बिल्कुल सीधा रखें। हाथों को दोनों बगल में सीधा शरीर से सटाकर व हथेलियों को फर्श की ओर करके रखें। अपने दोनों पैरों, एड़ियों व पंजों को मिलाकर सामने की ओर करके सीधा व तानकर रखें। अब ऊपर देखते हुए धीरे-धीरे श्वास को अन्दर खींचते हुए पूर्ण रूप से वायु को फेफड़ों में भर लें। इसके बाद अपनी सांस को रोक कर अपने दोनो पैरों को धीरे-धीरे ऊपर (लगभग 10 इंच) तक उठाएं। इस स्थिति में 6 से 8 सैकेंड तक रहें और फिर धीरे-धीरे सांस बाहर छोड़े और पैरों को धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में ले आएं। इसके बाद 6 से 8 सैकेंड तक आराम करें और पुन: इस क्रिया को करें। इस तरह से इस क्रिया को 10 बार करें। पैरों को 10 इंच की ऊंचाई पर रखने में परेशानी हो तो पैरों को थोड़ा और ऊपर उठा लें। इससे पैरों पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है।

  • विशेष :

पैरों को ऊपर उठाते समय आपस में मिलाएं रहें लेकिन कमर से ऊपर का भाग नहीं हिलना चाहिए। अपने पैर को 10 इंच से अधिक ऊपर न उठाएं क्योंकि इतनी ऊंचाई पर पैरों पर अधिक जोर नहीं पड़ता है। इस आसन को खाली पेट सुबह व शाम कर सकते हैं। इस आसन को दोनो पैरों से 3-3 बार करें। इस आसन को स्त्री-पुरुष तथा 6 से 7 वर्ष के बच्चे भी कर सकते हैं। इस आसन का लाभ सर्वांगासन की तरह ही होता है। जिन्हें पीठ पर चोट लगी हो या जो बहुत कमजोर हो उन्हें पहले ´अर्द्ध उत्तानपादासन´ का अभ्यास करना चाहिए।

  • अद्ध उत्तानपादासन करने की विधि (Uttanpadasana Yoga Vidhi) :

इस आसन में दोनों पैरो को एक साथ ऊपर उठाने के स्थान पर एक-एक पैर को बारी-बारी से ऊपर उठाकर इस आसन को पहले की ही तरह से करें। पहले पूर्ण रूप से सांस लेकर सांस को रोकते हुए पहले बांए पैर को ऊपर उठाएं और कुछ देर रुककर फिर सांस छोड़ते हुए पैर को सामान्य स्थिति में ले आएं। यही क्रिया दाएं पैर के साथ भी करें ! यह अभ्यास दोनों पैरों से 10-10 बार करें। इस आसन का अभ्यास पूर्ण रूप से करने में सफल होने के बाद उत्तानपादासन करें।

  • दूसरी विधि : 

Uttanpadasana Yoga – आसन के अभ्यास के लिए पहले की तरह ही स्थान को चुनें और नीचे दरी बिछाकर पीठ के बल लेट जाएं। दोनों हाथों को दोनो बगलों में नितम्ब (हिप्स) से सटाकर रखें। दोनो पैरों को आपस में मिलाकर व तानकर रखें। अब धीरे-धीरे दोनो पैरों को ऊपर उठाएं और साथ ही सिर को भी ऊपर उठाएं ! इस तरह सिर से नाभि तक के भागों को और पंजों से जांघों तक के भाग को ऊपर उठा लें। आसन की इस स्थिति में पूरे शरीर का भार कमर पर रखें और हाथों को फर्श से ऊपर जांघों पर रखें। इसमें शरीर के दोनो ओर का भाग बराबर उठा रहता हैं। जितनी देर तक इस स्थिति में रहना सम्भव हो रहें और फिर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं।

  • विशेष : 

इस आसन के शुरुआती अभ्यास में शरीर में कंपन होता है, परंतु इसके नियमित अभ्यास से शरीर में स्थिरता और मजबूती आती है।

  • सावधानी ( Uttanpadasana Yoga Savdhani) : 

उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर), सर्वाईकल, स्पोंडिलाइसिस आदि रोगों वाले रोगियों को यह आसन नहीं करना चाहिए। इस आसन को करने से मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) पर जोर पड़ता है. इसलिए मेरूदंड व कमर में किसी भी प्रकार का दर्द या कष्ट आदि हो तो उसे `पूर्ण उत्तानपादासन´ नहीं करना चाहिए। इस आसन के स्थान पर `अर्द्ध उत्तानपादासन´ करना लाभकारी होता है।

  • आसन से रोग में लाभ (Uttanpadasana Yoga Labh) :
  • पहली विधि : 

Uttanpadasana Yoga – इस आसन से मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) मजबूत तथा शरीर के अन्दर की सभी कोशिकाएं पुष्ट होती हैं। यह आसन स्नायुतंत्र (नर्वससिस्टम) को क्रियाशील बनाता है तथा उनके विकारों को दूर करता है। यह आसन शरीर की 72000 नाड़ियों को प्रभावित करता है जिससे उनमें उत्पन्न होने वाली सारी बीमारियां ठीक हो जाती है। इस आसन से पेट व नितम्बों की चर्बी घटती है तथा पेट की आन्तरिक गड़बड़ियां, जलोदर (पेट में पानी का भरना) और आमाशय की जलन मिटती है। यह आसन पाचनशक्ति को मजबूत करता है तथा भूख को बढ़ाता है। इस आसन को करने से नाभि का टलना बन्द हो जाता है तथा जिसकी नाभि टल गई हो उसे यह आसन 5 मिनट तक करना चाहिए ! इससे नाभि अपने वास्तविक स्थान पर आ जाती है। इससे अपच (खाना न पचना), भोजन के बाद खट्टी-मीठी डकारें आना, वमन (उल्टी), पेट में गैस बनना, कोष्ठबद्धता, सामान्य दस्त, मरोड़, खूनी दस्त आदि ठीक होते हैं। इससे पीठ का दर्द, पैरों का दर्द, पेट का दर्द आदि दूर होते हैं। यह आसन खून को साफ करने के साथ-साथ पैरों का सुन्न हो जाना व झन्नाहट आदि शिकायतें भी दूर करता है। इस आसन को करने से कद बढता है।
प्रसव के बाद महिलाओं के स्वाभाविक स्थिति में आने के बाद इस आसन को करने से पेड़ू का भददापन दूर होता है। इसके अभ्यास से हर्निया रोग नहीं होता है। इस आसन के निरंतर अभ्यास से घबराहट, दिल की धड़कन तेज होना, सांस फूलना और खांसी आदि रोग दूर होते हैं।

  • दूसरी विधि :

Uttanpadasana Yoga – यह आसन नाभि के चार महत्त्वपूर्ण आसनों में से एक है.  इसके अभ्यास से नाभि तंत्र की 72864 नाड़ियों की मसाज होती है। यह रक्तसंचार को ठीक करता है तथा घबराहट को दूर करता है।

उत्तान कूर्मासन योग ( Uttana Kurmasana Yoga )

उत्तान कूर्मासन योग ( Uttana Kurmasana Yoga ) :

उत्तान कूर्मासन योग ( Uttana Kurmasana Yoga ke Labh in Hindi ) :

  • आसन का अभ्यास :

उत्तान कूर्मासन के अभ्यास के लिए नीचे दरी या चटाई बिछाकर बैठ जाएं। फिर दोनों पैरों को घुटनों से मोड़कर नितम्ब के नीचे रख लें। पंजों को मिलाकर एड़ियों को थोड़ा अलग रखें। अब पूरे शरीर का भार एड़ी व पंजों पर डालकर बैठ जाएं। हाथों को कमर के नीचे जमीन पर रखें। फिर शरीर का संतुलन बनाते हुए धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकते हुए शरीर को जमीन पर टिका दें। इसके बाद दोनों हाथों को दोनों जांघों पर रखें ! आसन की इस स्थिति में कंधे व गर्दन को जमीन से सटाकर रखें और श्वासन क्रिया सामान्य रूप से करें। आसन की स्थिति में जितनी देर तक रहना सम्भव हो रहें।

  • सावधानी (Uttana Kurmasana Yoga Savdhani) :

इस आसन का अभ्यास अल्सर, कोलाइटिस, उच्च रक्तचाप वालों को नहीं करना चाहिए।

  • आसन से रोगों में लाभ (Uttana Kurmasana Yoga Labh) :

इस आसन के अभ्यास से सांस से सम्बंधित बीमारियां दूर होती है। यह आसन दमा, बोंक्राइटिस, टी.बी. आदि रोगों को ठीक करता है। इससे कमर की मांसपेशियां मजबूत और कमर लचीली और पतली बनती है। यह आसन पेट की अधिक चर्बी को कम करके मोटापे को दूर करता है। इससे घुटनों व पिंडलियों का दर्द कम होता है और मेरूदंड (रीढ़ की हड्डी) लचीला बनता है। नाड़ियों में रक्तसंचार ठीक रखने के लिए यह आसन लाभकारी है और यह आसन खून को भी साफ करता है।

उदराकर्षासन योग ( Udarakarshanasana Yoga )

उदराकर्षासन योग ( Udarakarshanasana Yoga ) :

  • आसन की विधि (Udarakarshanasana Yoga Vidhi) :

Udarakarshanasana Yoga – उदराकर्षासन का अभ्यास स्वच्छ व साफ स्थान पर करें तथा इस आसन के लिए नीचे दरी बिछाकर बैठ जाएं। अब बाएं पैर को घुटने से मोड़कर नितम्ब (हिप्स) के नीचे रखें तथा घुटने व पंजे को फर्श से सटाकर रखें। फिर दाएं पैर को घुटने से मोड़कर एड़ी व पंजे को बाएं पैर के घुटने के पास फर्श से टिकाकर रखें तथा घुटने को ऊपर की ओर रखें। दोनों पैरों के बीच 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी रखें। दोनों हाथों को दोनों घुटनो पर रखें। अब ऊपर उठे दाएं घुटने को दाएं हाथ से जोर से दबाकर नीचे बाएं घुटने के पास फर्श के जितना पास हो लाएं और ध्यान रखें कि घुटने को फर्श से एक इंच ऊपर ही रखें। दाएं घुटने को नीचे लाते समय मुंह को कंधे की सीध में रखें। आसन की इस स्थिति में कुछ समय रहें और फिर यही क्रिया बाएं पैर से भी करें।

  • आसन से रोग में लाभ (Udarakarshanasana Yoga Labh) :

इस आसन को करने से अपच (भोजन का न पचना) तथा कब्ज का रोग दूर होता है ! इस आसन के निरंतर अभ्यास से पैरों का दर्द दूर होता है तथा पंजे शक्तिशाली बनते हैं। कमरदर्द, जोड़ों में किसी भी प्रकार की खराबी आदि में भी इस आसन को करना लाभकारी रहता है।

उपविष्टासन योग ( Upvasishta Yoga Ke Labh )

उपविष्टासन योग के लाभ ( Upvasishta Yoga Ke Labh ) :

उपविष्टासन योग के लाभ( Upvasishta Yoga ke Labh in Hindi ) :

  • आसन की विधि (Upvasishta Yoga ki Vidhi) :

Upvasishta Yoga – स्वच्छ-साफ व हवायुक्त स्थान पर नीचे दरी या चटाई बिछाकर उपविष्टासन आसन का अभ्यास करें। आसन के लिए पहले नीचे बैठ जाएं। दोनो पैरों को जितना सम्भव हो दोनो बगल में फैलाएं और दोनो घुटनों को बिल्कुल सीधा रखें। फिर गहरी सांस लेते हुए दाईं ओर झुकते हुए दोनो हाथों से पैरों के पंजों को पकड़ लें। फिर आगे की ओर धीरे-धीरे सिर को झुकाते हुए दाएं घुटने से सिर को टिकाएं और जितनी देर तक सांस को रोकना सम्भव हो रोककर रखें। फिर सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं और सामान्य रूप से सांस लें। अब इस क्रिया को बाईं ओर झुककर करें। इस क्रिया को दोनों तरफ से करने के बाद सांस छोड़ते हुए आगे की ओर झुककर दोनों हाथों को फैलाकर दोनों पैर के पंजों को पकड़ लें और सिर को फर्श से टिकाने की कोशिश करें ! सांस रोकने के क्रम में पहले जितना सम्भव हो रोकें और धीरे-धीरे इसका अभ्यास बढ़ाकर 1 मिनट तक कर दें। इस तरह से इस क्रिया को 2 से 3 बार करें।

  • उपविष्टासन योग सावधानी (Upvasishta Yoga me Savdhani) :

शुरू-शुरू में इस आसन के अभ्यास के समय सिर यदि घुटनो में या सामने की ओर फर्श से टिकाना कठिन हो तो शुरू में जितना सम्भव हो घुटनो से टिकाने की कोशिश करें और धीरे-धीरे इस आसन को पूर्ण करने की कोशिश करें.  इस आसन में पैरों को भी जितना सम्भव हो बगल में फैलाएं।

  • आसन से रोगों में लाभ (Upvasishta Yoga Labh) :

इस आसन के अभ्यास से हाथ व पैर पुष्ट व मजबूत होते हैं तथा पूरे शरीर में स्फूर्ति व ताजगी आती है।

उर्ध्वहस्तोत्तानासन योग ( Urdhva Hastottnasan Yoga )

उर्ध्वहस्तोत्तानासन योग ( Urdhva Hastottnasan Yoga ) :

उर्ध्वहस्तोत्तानासन योग ( Urdhva Hastottnasan Yoga ke Labh in Hindi ) :

  • परिचय-

Urdhva Hastottnasan Yoga – उर्ध्वहस्तोत्तानासन का अभ्यास खुले व हवादार स्थान पर करें। इस आसन को करने से शरीर में खिंचाव पैदा होता है और अनेक रोगों में लाभ होता है। यह शंख प्रक्षालन के 4 आसनों में से एक आसन है। शंख प्रक्षालन की क्रिया को इस आसन के बिना पूरा करना असम्भव है।

  • आसन करने की विधि (Urdhva Hastottnasan Yoga Vidhi) :

इस आसन के अभ्यास के लिए सीधे सावधान की स्थिति में खड़ें हो जाएं फिर दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में जोड़कर ऊपर की ओर उठाएं। हाथों को ऊपर उठाते हुए हथेलियों को ऊपर की ओर रखें। आसन की इस स्थिति में आने के बाद हाथों को ऊपर की ओर खींचते हुए शरीर में खिंचाव लाएं और धीरे-धीरे दाईं तरफ जितना सम्भव हो झुकें। कुछ क्षण तक इस स्थिति में रहे और फिर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं ! इसके बाद फिर धीरे-धीरे बाईं तरफ झुकें और कुछ क्षण रुकें। फिर धीरे-धीरे सीधे खड़े हो जाएं। इस आसन को करते समय घुटनों व हाथों को तानकर रखें तथा इसे दोनों तरफ से बराबर-बराबर करें।

  • आसन के अभ्यास से रोगों में लाभ (Urdhva Hastottnasan Yoga Labh) :

उर्ध्वहस्तोत्तानासन के अभ्यास से शरीर की लंबाई बढ़ती है और सभी अंगों का विकास होता है। यह शंख प्रक्षालन के 4 आसनों में से एक आसन है तथा इस आसन के बिना शंख प्रक्षालन क्रिया को पूरा करना सम्भव नहीं है। यह आसन छाती को चौड़ा करता है, कमर को पतली बनाता है तथा नितम्ब पर बनी अधिक चर्बी को खत्म करता है। इसके द्वारा शरीर आकर्षक व सुन्दर बनता है। इससे आंतों की मसाज अच्छी तरह से हो जाती है। इसके अभ्यास से कब्ज मिटती है. पसली का दर्द दूर होता है। यह आसन शंख प्रक्षालन की शोधन क्रिया में किया जाता है. जिसे वारिसार भी कहते हैं। इस आसन को करने से साईटिका का दर्द तथा कमर व जांघों का भारीपन समाप्त होता है। इस आसन को गर्भवती स्त्रियां भी कर सकती हैं। जिन लोगों को कब्ज की शिकायत अधिक रहती हो उन्हें सुबह 2 गिलास पानी पीने के बाद ताड़ासन करना चाहिए। फिर इसके बाद ऊर्ध्व हस्तपदासन का अभ्यास दोनों ओर से 4-4 बार करें और अंत में कटिचक्रासन का अभ्यास करके इस आसन को पूरा करें।

उष्टासन योग ( Ustrasana Yoga Ke Labh )

उष्टासन योग ( Ustrasana Yoga ) :

उष्टासन योग ( Ustrasana Yoga Ke Labh in Hindi ) :

  • परिचय :

उष्टासन आसन के अभ्यास में व्यक्ति ऊंट की तरह गर्दन उठाकर अभ्यास करता है। इसलिए इसे योग में उष्टासन कहा गया है। इसके अभ्यास से गले की ग्रंथियों की शिकायत दूर होती है और रीढ़ की हड्डी मजबूत व लचीली होती है।

  • आसन की विधि (Ustrasana Yoga Vidhi) :

इस आसन के अभ्यास के लिए पहले नीचे दरी या चटाई बिछाकर खड़े हो जाएं। अब दोनों घुटनों को मोड़कर पीछे की ओर करके घुटनों के बल बैठ जाएं। दोनों एड़ी व घुटनों के बीच आधे इंच की दूरी रखें। फिर धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकते हुए पहले एक हाथ से पैर की एड़ी को पकड़ें, फिर दूसरे हाथ से पैर की एड़ी को पकड़ें। अब घुटनों से ऊपर के भाग को 70 डिग्री का कोण बनाते हुए शरीर को सीधा रखें। फिर सांस लेकर धीरे-धीरे शरीर को पीछे की ओर झुकाते हुए सिर को नीचे की ओर लाएं। आसन की इस स्थिति में हाथ व कमर को तान कर रखें और मुंह को ऊपर की ओर रखें ! कुछ समय तक इस स्थिति में रहने के बाद धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए सामान्य स्थिति में आ जाएं और कुछ समय तक आराम करने के बाद पुन: इस आसन को करें। इस तरह से इस क्रिया को 3 बार करें।

  • सावधानी (Ustrasana Yoga Savdhani) :

उष्टासन को शुरू-शुरू में करने में कठिनाई होती है, इसलिए कमर से पीछे की ओर झुकने में सावधानी रखें। पीछे झुकते समय अधिक जोर लगाने की कोशिश न करें क्योंकि इससे कमर व रीढ़ की हड्डी पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है इसलिए इस आसन को धीरे-धीरे पूरा करने की कोशिश करें। उष्टासन आसन का अभ्यास पूर्व दिशा की ओर मुंह करके करें। इस आसन के समय शरीर का सारा भार दोनो घुटनों पर पड़ता है, इसलिए घुटनों के नीचे मोटा तथा कोमल कपड़ा बिछाकर आसन को करें।

  • आसन से रोगों में लाभ (Ustrasana Yoga Labh) :

इस आसन के अभ्यास से पूरा श्वासन तंत्र प्रभावित होता है। यह फेफड़े तथा दमा के रोगियों के लिए अधिक लाभकारी है। यह आसन फेफड़ों को मजबूत बनाता है। इसके अतिरिक्त गले की ग्रंथियों की शिथिलता दूर होती है. पीठ की मांसपेशियों को सख्त बनाता है तथा पेट की अधिक चर्बी को कम करता है। इससे बार-बार सर्दी-जुकाम होना तथा साइटिका रोग ठीक होता है। इसके अभ्यास से पीठ, कमर एवं कंधों की मांसपेशियां मजबूत व लचीली होती है।

इस आसन के अभ्यास से चेतना तरंग रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ती है, जिससे मन शांत होकर आनन्द उल्लास की स्थाई तरंगों द्वारा मस्तिष्क में पहुंचकर व्यक्ति में अदभुत गुण उत्पन्न करता है ! मस्तिष्क में इन तरंगों को पहुंचाना आसान नहीं होता है, इसलिए इस आसन के द्वारा इन तरंगों को मस्तिष्क में पहुंचाने की कोशिश की जाती है। जब व्यक्ति में दैविक गुणों का समावेश हो जाता है तो उसे चेतना तरंग रीढ़ की हड्डी में चढ़ती हुई महसूस होती है। यह ब्रह्मण्डीय चेतना की तरंग होती है। इसलिए योगी इस तरंग को मूलाधार से ग्रहण करके ब्रह्मरंध्र से निकालने का अभ्यास करते हैं। इसमें सफलता मिलने पर व्यक्ति में अनेक आलौकिक शक्तियां आ जाती हैं।

उष्ट्रासन योग ( Ushtrasana Yoga Ke Labh )

उष्ट्रासन योग ( Ushtrasana Yoga ) :

उष्ट्रासन योग ( Ushtrasana Yoga in Hindi ) :

  • परिचय :

उष्ट्रासन को दो तरह से किया जाता है। इस आसन का अभ्यास अनेक रोगों में लाभकारी होता है तथा योग में इस आसन को महत्वपूर्ण आसन माना गया है।

  • आसन की विधि (Ushtrasana Yoga ki Vidhi) –

पहली विधि :

इस आसन का अभ्यास स्वच्छ व शांत स्वच्छ हवादार वातावरण में करना चाहिए। इस आसन को करने के लिए जमीन पर दरी बिछाकर घुटनों के बल खड़े हो जाएं अर्थात दोनो पैरों को घुटनों से मोड़कर पीछे की ओर ले जाकर घुटनों के सहारे सीधे खड़े हो जाएं। इसके बाद दोनों घुटनो को मिलाकर तथा एड़ी व पंजों को मिलाकर रखें। अब सांस अंदर खींचते हुए धीरे-धीरे शरीर को पीछे की ओर झुकाकर दोनों हाथों से दोनों एड़ियों को पकड़ने की कोशिश करें ! इस स्थिति में ठोड़ी ऊपर की ओर करके व गर्दन को तान कर रखें और दोनों हाथों को भी तानकर सीधा रखें। सामान्य रूप से सांस लेते हुए इस स्थिति में 30 सैकेंड से 1 मिनट तक रहें और फिर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में आ जाएं। इसके बाद सामान्य रूप से सांस लेते हुए 2 मिनट तक आराम करें और फिर इस क्रिया को करें। इस तरह इस क्रिया को 3 बार करें।

दूसरी विधि :

Ushtrasana Yoga – इस आसन में पहले की तरह ही घुटनों के बल बैठ जाएं और फिर घुटनों व एड़ियों को मिलाकर रखें। इसके बाद सांस लेकर शरीर को धीरे-धीरे पीछे की ओर झुकाते हए दोनों हाथों को पीछे पंजों से आगे फर्श पर टिकाएं और शरीर को सीधा व तानकर रखें। इस स्थिति में आने के बाद सांस सामान्य रूप से लेते हुए इस स्थिति में आधे से 1 मिनट तक रहें। इसके बाद सामान्य स्थिति में आकर 2 मिनट तक आराम करें। इस क्रिया को 3 बार करें।

  • विशेष :

दूसरी विधि पहले से आसान है, इसलिए पहली विधि से आसन करने में कठिनाई हो तो पहले दूसरी विधि से आसन का अभ्यास करे और उसके बाद पहली विधि का आसन करें।

  • आसन से रोगो में लाभ (Ushtrasana Yoga Labh) :

उष्ट्रासन मेरूदंड में लचीलापन लाता है तथा जीवनी शक्ति को बढ़ाकर युवावस्था को अधिक समय तक बनाएं रखता है। यह आसन फेफड़े के रोगों को दूर करता है। इस आसन से छाती चौड़ी तथा जांघें, बांहे व टांगे मजबूत होती हैं। यह पेट व आमाशय के रोगों को दूर करता है तथा कामेन्द्रियो को पुष्ट करता है ! उष्ट्रासन पेट की चर्बी को कम करता है तथा मोटापे को दूर कर शरीर को सुडौल व सुंदर बनाता है। इस आसन को करने से स्त्रियों के अनेक रोग दूर हो जाते हैं तथा यह गर्दन की अधिक चर्बी को कम करके उसे पतली व सुंदर बनाता है। इस आसन से पीठदर्द, कमरदर्द आदि ठीक होते हैं। इस आसन को करने से कंठ, श्वासनली तथा फुफ्फुस की क्रियाशीलता बढ़ती है तथा कंठ व सांस के सभी रोगों से बचाव होता है।

ऊर्ध्व पद्मासन योग ( Urdhva Padmasana Yoga )

ऊर्ध्व पद्मासन योग ( Urdhva Padmasana Yoga ) :

ऊर्ध्व पद्मासन योग ( Urdhva Padmasana Yoga in Hindi ) :

  • परिचय :

शीर्षासन का अभ्यास पूर्ण रूप से होने के बाद ही इस आसन को करना चाहिए। शीर्षासन के अभ्यास के बिना इस आसन को करने से गर्दन में मोच या चोट लगने तथा गिरने का डर बना रहता है।

  • ऊर्ध्व पद्मासन की विधि (Urdhva Padmasana Yoga Vidhi) :

आसन का अभ्यास साफ-स्वच्छ, शांत व हवादार स्थान पर करें। आसन के लिए नीचे दरी या चटाई बिछा लें और सिर को रखने के लिए एक गददा रखें जिस पर सिर को रखकर संतुलन बना सकें। अब दोनो हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर गददे पर रखें। इसके बाद हथेलियों के बीच में सिर को रख कर धीरे-धीरे शरीर को ऊपर उठाएं। दोनो पैरों को ऊपर सीधा करने के बाद शरीर का संतुलन बनाकर रखें। अब पैरों को मोड़कर ऊपर ही पद्मासन लगाएं। आसन की इस स्थिति में जितने देर सम्भव हो रहें और फिर सामान्य स्थिति में आ जाएं।

  • सावधानी (Urdhva Padmasana Yoga Savdhani) :

शीर्षासन का अभ्यास पूर्ण करने के बाद ही ऊर्ध्व पद्मासन का अभ्यास करना चाहिए। शीर्षासन के अभ्यास के समय शरीर का रक्त सिर में पहुंचने लगता है। इसलिए इस आसन को करने से पहले अन्य आसनों का अभ्यास करना चाहिए। अन्य दूसरे आसनों के अभ्यास के बिना शीर्षासन का अभ्यास करने से शरीर के अन्दर का दूषित रक्त शीर्षासन के समय मस्तिष्क में पहुंचकर हानि हो सकती है ! इसलिए किसी अन्य आसनों के अभ्यास के बिना ऊर्ध्व पद्मासन को नहीं करना चाहिए। ऊर्ध्व पद्मासन या शीर्षासन को करने से पहले सर्वांगासन का अभ्यास करना लाभकारी होता है। किसी अन्य आसनों को करने के बाद ऊर्ध्व पद्मासन करने के बाद शवासन क्रिया जरूर करें।

हृदय के रोगियों को शीर्षासन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। 40 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को सावधानी से इस आसन को करना चाहिए। शीर्षासन का अभ्यास किसी अच्छे योग गुरू की देख-रेख में ही करें।

  • आसन से रोगों में लाभ (Urdhva Padmasana Yoga Labh) :

अध्यात्मिक दृष्टि से यह आसन बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस आसन के अभ्यास से शरीर नियंत्रण में बना रहता है। इस आसन से मन शांत व इन्द्रियां वश में रहती है। इससे मन एकाग्र होता है, जिससे मन को अध्यात्मिक विचारों का लाभ होता है। इस आसन से मेरूदंड लचीला बनता है, मांसपेशियां मजबूत बनती है. जिससे व्यक्ति का युवाकाल अधिक समय तक बना रहता है। इस आसन के अभ्यास से अनेक रोग जैसे- बालों का झड़ना, बालों का टूटना आदि दूर होते हैं, याददाश्त तेज होती है। इससे शरीर चमकदार, चेहरा सुन्दर तथा आयु में वृद्धि होती है, आंखों की रोशनी बढ़ती है तथा पाचन तंत्र शक्तिशाली बनता है। ये आसन वीर्य सम्बन्धी दोषों को दूर करता है तथा स्वप्नदोष के विकारों को रोकता है।

  • बुद्ध पदमासन की विधि :

इस आसन का अभ्यास स्वच्छ व साफ हवादार स्थान पर ही करें। इसके अभ्यास के लिए नीचे बैठ कर दाएं पैर को मोड़कर बाएं पैर की जांघ पर रखें और बाएं पैर को मोड़कर दाईं जांघ पर रखें। आसन की इस स्थिति में पैरों की दोनो एड़ियों को बगल में कमर से सटाकर रखें। दाएं हाथ को पीठ के पीछे से लाकर बाएं पैर के पंजे को पकड़े और बाएं हाथ को पीठ के पीछे से लाकर दाएं पैर के पंजे को पकड़े ! आसन की स्थिति में दोनो हाथों से पीछे और दोनों पैरों से आगे क्रॉस का निशान बनाते हुए पूरे शरीर को बांधने जैसा बना लें। अब आंखों को बन्द करके दोनो के बीच में ध्यान को एकाग्र करें। इस अभ्सास को 2 से 5 मिनट तक करें।

  • सावधानी :

इस आसन के अभ्यास की शुरूआत में पैर के पंजे या अंगूठे को पकड़ने में कठिनाई होती है इसलिए इसका अभ्यास धीरे-धीरे करें।

  • आसन से रोगों में लाभ :

इस आसन के अभ्यास से छाती चौड़ी होती है तथा ये आसन थायराइड ग्रंथि को ठीक कर इसके काम को सुचारू करता है। इससे गर्दन, कंधे, पीठ, जांघ तथा टखनों की मांसपेशियां लचकदार बनती है ! यह हृदय को मजबूत करता है, शरीर की दुर्बलता दूर करता है तथा घुटने, कंधे, कमर, पीठ के दर्द को ठीक करता है। बैठकर काम करने से उत्पन्न थकान को दूर करने के लिए यह आसन अधिक लाभकारी है।

ऊर्ध्व हस्तोतानासन योग ( Urdhva hastasana Yoga )

ऊर्ध्व हस्तोतानासन योग ( Urdhva hastasana Yoga ) :

ऊर्ध्व हस्तोतानासन योग ( Urdhva hastasana Yoga in Hindi ) :

इस आसन में दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर ऊपर की ओर खींचा जाता है इसलिए इसका नाम ऊर्ध्व हस्तोतानासन रखा गया है।

  • आसन की विधि  (Urdhva hastasana Yoga Vidhi) :

आसन के लिए पहले सीधे सावधान की स्थिति में खड़े हो जाएं। अब दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसाकर ऊपर की ओर खींचे। फिर सांस खींचते हुए पहले दाईं तरफ और फिर बाईं तरफ झुकें।

  • आसन से रोगों में लाभ (Urdhva hastasana Yoga Labh) :

ऊर्ध्व हस्तोतानासन के अभ्यास से शरीर की लंबाई बढ़ती है और शरीर के सभी अंगो का विकास होता है। यह शंख प्रक्षालन के 4 आसनों में से एक आसन है तथा इस आसन के बिना शंख प्रक्षालन क्रिया को पूरा करना सम्भव नहीं है। यह आसन छाती को चौड़ा करता है, कमर को पतली बनाता है तथा नितम्ब पर बनी अधिक चर्बी को खत्म करता है। इसके द्वारा शरीर आकर्षक व सुन्दर बनता है। इससे आंतों की मसाज अच्छी तरह से हो जाती है। इसके अभ्यास से कब्ज मिटती है, पसली का दर्द दूर होता है। यह आसन शंख प्रक्षालन की शोधन क्रिया में किया जाता है जिसे वारिसार भी कहते हैं। इस आसन को करने से साईटिका का दर्द तथा कमर व जांघों का भारीपन समाप्त होता है। इस आसन को गर्भवती स्त्रियां भी कर सकती है। जिन लोगों को कब्ज की शिकायत अधिक रहती हो उन्हे सुबह 2 गिलास पानी पीने के बाद ताड़ासन करना चाहिए ! फिर इसके बाद ऊर्ध्व हस्तपदासन का अभ्यास दोनों ओर से 4-4 बार करें और अंत में कटिचक्रासन का अभ्यास करके इस आसन को पूरा करें। इस आसन को करने से आंतों की पूर्ण सफाई हो जाती है. इसलिए जिसे आंतों की पूर्ण सफाई करनी हो उसे सुबह एक गिलास हल्का गर्म पानी पीकर ´ताड़ासन ´ करने के बाद ´उर्ध्वहस्तोत्तानासन´ का अभ्यास करना चाहिए।

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